गुरुवार, 26 मई 2011

एक थे इशरत कादरी

ऊंचा कद, सफेद कुर्ते पायजामें में छिपी छरहरी काया, चेहरे पर 85 बसंत के तजुर्बों की तमाम लकीरें और गैस त्रासदी के असर से लगातार आंसुओं से भीगी रहने वाली आंखें। जिंदगी के आखिरी दौर में कुछ इसी तरह के थे अदबी शहर भोपाल के मशहूर शायर इशरत कादरी। आंखों की तकलीफ की वजह से उन्हें लिखने-पढ़ने में तकलीफ होने लगी थी, और जिंदगी के आखिरी पलों में तो रीढ़ की हड्डियों की तकलीफ ने उन्हें बिस्तर से नहीं उठने दिया।सात महीने में हुई तीन मुलाकातों में उनको इतना जान सका कि वे अजनवी से भी ऐसे मिलते थे, जैसे उनका बरसों पुराना दोस्ताना रहा हो, अपने दिल की किताब खोलकर रख देते, मदद के लिए हमेशा तैयार रहते, यही वजह है कि भोपाल में सबसे ज्यादा शायरों की रहनुमाई अगर किसी शायर ने की है तो वो हैं इशरत कादरी। अपने नाम के मुताबिक उन्होंने तमाम शायरों को उंगली पकड़कर चलना सिख्राया है। इशरत लफ्ज अरबी के इशराह से बना है, जिसके मानी हैं, रास्ता दिखाने वाला या रहनुमा। इशरत कादरी शहर के उस्ताद शायर सिर्फ इसलिए नहीं हैं कि उनके तमाम शायर शागिर्द हैं। बल्कि इसलिए भी हैं कि उनके पास तमाम तजुर्बों का खजाना था, और उन्हें आसान लफ्जों में कहने का उस्तादी हुनर था। वे एक जगह कहते हैं,वो जिंदगी थी जिसे जी लिया करीने से,खबर भी अब नहीं अपनी कई महीने से।तमाम तेहरे हैं तस्वीर परदे- परदे पर,अजीब रिश्ता है जेरे जमीं मकीनों सेवो आबदीदा मेरी ताजियत को आए,टपक रहा है लहू जिनकी आस्तीनों से।इशरत कादरी की शायरी का हर लफ्ज इसलिए भी आम लोगों तक अपनी पहुंच रखता है क्योंकि उनकी शायरी में हिंदुस्तानी तहजीब की खुशबू आती है। देखिए एक बानगी।सुरमयी, कासनी, ऊदे, कहीं काले बादल,अब कि बरसात में छाए हैं निराले बादल।जूड़ा खोले हुए पनघट पे खड़ी है गोरी,बिखरे बालों की घटाएं न चुरा लें बादल।इशरत कादरी की पैदाइश भोपाल के नजदीकी छोटे से शहर सीहोर में 1926 में हुई। उनके वालिद सैयद सईद अहमद नायब तहसीलदार थे, वे वहां से रिटायरमेंट के बाद कलेक्टोरेटमें मुलाजिम हो गए थे। एक बहन और पांच भाईयों में एक इशरत कादरी का असल नाम सगीर अहमद था। इशरत कादरी हालात की वजह से मेट्रिक से ज्यादा तालीम हासिल नहीं कर सके। शुरूआत में इशरत कादरी नात शरीफ, हम्द शरीफ लिखा करते थे। धीरे-धीरे वे गजलें और नज्म भी कहने लगे। हम्द शरीफ की एक बानगी देखिए-जग का दाता तू ही तन्हा अल्लाह सार्इं,कोई नहीं है तुझसा दूजा अल्लाह सार्इं।नाम की तेरे माला जपते पंख पखेरू,तू ही प्रभु तू ही मौला अल्लाह सार्इं।
अदब की खिदमत के लिए उन्होंने कई मरकज कायम किए और 1946 में उन्हें मरकज़े अदब कायम की। इसके तहत अदबी मेहफिले जमा करती थीं। लिटरेचर पर चर्चा होती थी। यह सिलसिला 1952 तक चला, फिर मरकाजे अदब को पब्लिशर्स बना दिया। तब से अब तक कई किताबें शाया कीं इनमें शायरी, मजामीन बगैर की किताबें शामिल हैं। इसके बाद कादरी लाइब्रेरी कायम की। इसके अलावा उर्दू राइटर्स गिल्ड, काजीवजदी उल हुसैनी अदबी फॉम्म बनाई। इन सभी का मकसद, अलग- अलग शायर, कवि, लेखक वगैरह को एक मंच पर लाना था इशरत कादरी की 1984 में उर्दू अकादमी के मार्फत शायरी की एक किताब ‘शहरनुमा’ शाया हुई। एक और किताब आसमां सायबां इस महीने शाया होने को तैयार है, लेकिन इससे पहले की यह किताब शाया हो पाती, इशरत कादरी ने 17 मई की अल सुबह इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।

कोई टिप्पणी नहीं: