अदब की खिदमत के लिए उन्होंने कई मरकज कायम किए और 1946 में उन्हें मरकज़े अदब कायम की। इसके तहत अदबी मेहफिले जमा करती थीं। लिटरेचर पर चर्चा होती थी। यह सिलसिला 1952 तक चला, फिर मरकाजे अदब को पब्लिशर्स बना दिया। तब से अब तक कई किताबें शाया कीं इनमें शायरी, मजामीन बगैर की किताबें शामिल हैं। इसके बाद कादरी लाइब्रेरी कायम की। इसके अलावा उर्दू राइटर्स गिल्ड, काजीवजदी उल हुसैनी अदबी फॉम्म बनाई। इन सभी का मकसद, अलग- अलग शायर, कवि, लेखक वगैरह को एक मंच पर लाना था इशरत कादरी की 1984 में उर्दू अकादमी के मार्फत शायरी की एक किताब ‘शहरनुमा’ शाया हुई। एक और किताब आसमां सायबां इस महीने शाया होने को तैयार है, लेकिन इससे पहले की यह किताब शाया हो पाती, इशरत कादरी ने 17 मई की अल सुबह इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
गुरुवार, 26 मई 2011
एक थे इशरत कादरी
अदब की खिदमत के लिए उन्होंने कई मरकज कायम किए और 1946 में उन्हें मरकज़े अदब कायम की। इसके तहत अदबी मेहफिले जमा करती थीं। लिटरेचर पर चर्चा होती थी। यह सिलसिला 1952 तक चला, फिर मरकाजे अदब को पब्लिशर्स बना दिया। तब से अब तक कई किताबें शाया कीं इनमें शायरी, मजामीन बगैर की किताबें शामिल हैं। इसके बाद कादरी लाइब्रेरी कायम की। इसके अलावा उर्दू राइटर्स गिल्ड, काजीवजदी उल हुसैनी अदबी फॉम्म बनाई। इन सभी का मकसद, अलग- अलग शायर, कवि, लेखक वगैरह को एक मंच पर लाना था इशरत कादरी की 1984 में उर्दू अकादमी के मार्फत शायरी की एक किताब ‘शहरनुमा’ शाया हुई। एक और किताब आसमां सायबां इस महीने शाया होने को तैयार है, लेकिन इससे पहले की यह किताब शाया हो पाती, इशरत कादरी ने 17 मई की अल सुबह इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
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