बड़ा तालाब और भोजपुर का ऐतिहासिक मंदिर, भोपाल की ये दो चीजें ऐसी हैं, जो यहां की तारीखी शुरूआत का सबूत कही जा सकती हैं। दर असल इन दोनों का तआल्लुक मालवा के परमार राजा भोज से है। राजा भोज का शासन काल 1010 ई. से 1055 तक माना जाता है। इसी दौर में भोपाल की स्थापना हुई थी। भोपाल का तालाब और भोजपुर का जैन मंदिर बनवाए जाने के पीछे कई कहानियां हैं। कहा जाता है कि राजा भोज जब 40 साल की उम्र के पायदान पर पहुंचा, तो उसे लाइलाज चर्म रोग (कोढ़) हो गया। राजा परेशान हो गया, उस दौर के तमाम मशहूर वैद्य, हकीमों से इलाज करवाया, लेकिन कोई फाइदा नहीं हुआ। बीमारी लगातार बढ़ती जा रही थी। फिक्रमंद राजा को उनके बुजुर्ग और तजुर्बेकारों ने सलाह दी कि आप जैसे अमीर राजा के लिए सिर्फ एक ही तरीका नजर आता है, कि एक ऐसा तालाब बनाया जाए जिसमें 360 नदियों और नालों का पानी रोका जा सके। इस पानी से स्नान करने पर यह मर्ज दूर हो सकता है। परेशान हो चुके राजा भोज ने मशबिरा माना और पूरे राज्य में ऐसी जगह तलाशन का हुक्म दिया, जो जहां 360 नदी-नालों के पानी को रोकने के लिए बांध बनाया जा सके। तमाम तलाश के बाद भोपाल से 17 मील दूर ग्राम तीरथ नगर को इसके लिए चुना गया। यहां युद्ध स्तर पर काम शुरू हुआ, जब यहां जुड़ने वाले नदी-नालों की गिनती हुई तो चार नालों की कमी पाई गई। इस कमी को दूर करने के लिए राज्य के जानकारों और बुजुर्गों से मशबिरा हुआ। किसी के पास इस मसले का हल नहीं मिला तो भोपाल के कालिया नामक गौंड ने इस मसले को हल किया। कालिया गौंड के बताए गए नालों का का बहाव बदलकर बेतवा नदी में मिलाए गए। जिस जगह नालों का पानी जमा किया गया, उस जगह का नाम कालिया गौंड के नाम पर कलियासोत रखा गया। इस तरह बांध और तालाब की तामीर हुई। यहां राजा भोज ने वैदिक पद्धति से स्नान किया और राजा को लाइलाज मर्ज दूर हो गया।
तालाब खुदवाकर किया राजा ने प्रायश्चित
राजा भोज के मर्ज को लेकर कई कहानियां प्रचलित रही हैं। दूसरी कहानी उनके प्रायश्चित से जुड़ी हुई है। इसके मुताबिक राजा भोज की मां जब गर्भवती हुई, जो राज्य के ज्योतिषियों ने एक तयशुदा वक्त के लिए भविष्यवाणी की, कि अगर इस दौरान जो भी संतान होगी वो अशुभ होगी, राज्य को इससे बड़ी हानि उठानी पड़ सकती है। ऐसे में जब रानी के संतान होने का वक्त आ गया तो उस अशुभ समय को टालने के लिए रानी के दोनों पैरों को ऊंची कर दी गर्इं। कहा तो ये भी जाता है कि उसको उल्टा लटका दिया गया, ताकि अशुभ घड़ी गुजर जाए। तय वक्त गुजर जाने के बाद संतान ने तो जन्म ले लिया लेकिन रानी की मौत हो गई। संतान भी सिर की वजाय पैरों की तरफ से पैदा हुई। उस बच्चे का नाम भोेज देवा रखा गया। डॉ.माजिद हुसैन की किताब भोपाल का इतिहास और हयात कुदसी में इसका उल्लेख मिलता है। राजा भोज को अपनी पैदाइश के दौरान अपनी मां को खो देने का बहुत दुख था, उसने इसका प्रायश्चित करने के लिए राज्य के विद्वानों से सलाह ली। उन्हें प्रायश्चित के लिए 7 नदी और नालों को मिलाकर तालाब बनाने का सुझाव दिया गया। जिससे पशु-पक्षियों को पानी मिलता रहे। सलाहकार कल्याण सिंह की सलाह पर राजा भोज ने भोपाल से 20 किमी दूर शम्सगढ़ के पास भव्य जैन मंदिर बनवाया गया और भोजपुर के पास एक संगम तलाश किया गया। यहां एक नदी की कमी को पूरा करने के लिए सीहोर से बहने वाली नदी को ताल से जोड़ा गया। कल्याण सिंह के नाम पर ही बांध का नाम कलिया सोत बांध पड़ा।
तिराह से निकला रियासत का संस्थापक
राजा भोज के शासनकाल (1010 ई। से 1055)के बाद लंबे समय तक भोपाल यह इलाका खाली रहा। ये पूरा इलाका एक जंगल में तब्दील हो गया था। करीब 18वीं शताब्दी में भोपाल की तारीख का दूसरा सफा शुरू हुआ, जो भोपाल रियासत के संस्थापक दोस्त मोहम्मद खान के आने के बाद शुरू होता है। दोस्त मोहम्मद खान का अफगानिस्तान के छोटे से गांव तिराह से यहां आया था। पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सरहदी इलाके के तिराह गांव में सन् 1672 के आसपास इज्जतदार घराने में पठान सरदार नूर मोहम्मद खान के घर दोस्त मोहम्मद खान की पैदाइश हुई। दोस्त मोहम्मद जवान होने तक अच्छा घुड़सवार, नामी शिकारी और तलवारबाज बन चुका था। पूरे अफगानिस्तान की तरह तिराह के नौजवान भी मुगल साम्राज्य और उसके अमीरों की शानो-शौकत और वीरता के चर्चों से वाकिफ थे। उस समय हर नौजवान इस मौके की तलाश में रहता था कि वह किसी तरह खैबर दर्रे को पार कर मुगल सेना में शामिल हो अपने ख्वाबों की तामीर कर सके। वे पीढ़ियों से अपने आसपास के गांवों में ऐसे लोगों को देखते आ रहे थे, जो खैबर दर्रे को पार कर मुगल सेना में शामिल हुए और फिर उनकी जिंदगी ही बदल गई। जब भी लौटते तो उनके पास पर्याप्त धन होता। उसी काल में, करीब 1697 के आसपास दोस्त मोहम्मद की सगाई पड़ोसी कबीले ओर्कजाई की एक लड़की मेहराज बीवी से कर दी गई, लेकिन उसके दुस्साहसी, लापरवाह और बिगडैल मिजाज को देखते हुए ही दोनों खानदानों ने आपसी रजामंदी से मेहराज बीवी का निकाह दोस्त मोहम्मद से करने के बजाय उसी के एक चचेरे भाई से करना तय कर दिया। इस पर दोस्त मोहम्मद ने खुद को अपमानित महसूस करते हुए उपद्रव मचा दिया। उसने अपने चचेरे भाई की हत्या करके मेहराज बीवी से जबरदस्ती निकाह कर लिया। नतीजतन दोनों खानदान उसके इस काम से परेशान हो गए और उसे समाज से अलग कर दिया गया। अपने आसपास के माहौल से दोस्त मोहम्मद परेशान हो गया। एक रात उसने चुपचाप अस्तबल के सबसे तंदुरुस्त घोड़े पर जीन कसी, एक तलवार ली और सोने के कुछ सिक्के जेब में भरकर अपने अनजाने भविष्य की तलाश में खैबर दर्रा पार कर हिंदुस्तान के लंबे सफर पर निकल पड़ा।
खशखो खां का सिर कलम कर दिया
अपने चचाजाद भाई के कत्ल और मेहराज बीवी से जबरदस्ती निकाह की वजह से समाज से बाहर कर दिए जाने के बाद दोस्त मोहम्मद परेशान हो गया। ऐसे में वह तिराह से निकल पड़ा। लंबा सफर तय करके वह जलालाबाद पहुंचा। जलालाबाद के उपनगर लौहारी में उसे अपने खानदान के कुछ लोग मिले। लौहारी जलालाबाद को आज थानगांव कहा जाता है, जो उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले से तकरीबन तीस किमी दूर दक्षिण में है। लौहारी के मुगल मनसबदार सरदार जलाल खान के खानदान ने दोस्त मोहम्मद को अपना मेहमान बनाया। हालांकि, अपने मिजाज के मुताबिक यहां भी किसी बात पर हुए झगड़े में दोस्त मोहम्मद ने जलाल खान के एक बेटे का कत्ल कर दिया। इसके बाद वह भागकर करनाल पहुंच गया। इत्तेफाक से यहां उसकी मुलाकात तिराह में उसको कुरान शरीफ की तालीम देने वाले मुल्ला जमाली से हो गई। उनके साथ वह एक साल रहा। यहां रहकर उसने हिंदुस्तान की तमाम बारीकियों को समझा। बाद में वह मुगल सेना के हथियारों की देखभाल करने वाले मीर फजलुल्लाह से जुड़ गया। उसे फौज में मामूली औहदे पर रखा गया था, लेकिन वह लगातार तरक्की करता गया। 1704 में उसे बुंदेलखंड में बगावती तारडी बेग की फौज से लोहा लेने का बड़ा काम उसको सौंपा। तारडी बेग की सेना का नेतृत्व सेनापति खशखो खां कर रहा था। युद्ध में जब मुगल सेना हारने लगी। तब दोस्त मोहम्मद खां ने सीधे खशखो खां पर हमला कर दिया। खशखो खां के हाथी ने जब उसे सूंड से पकड़कर ऊपर उठाया, तब किसी तरह दोस्त मोहम्मद ने खुद को छुड़ाया और हाथी पर चढ़कर खशखो खां का सिर कलम कर दिया दिया। कहा जाता है, दोस्त मोहम्मद की इस बहादुरी से खुश हो खुद औरंगजेब ने उसे कई तोहफे दिए। उसको तकत्ती देकर मालवा भेजा गया। मधयभारत के इलाके में उस वक्त गोंड और भील रहा करते थे तथा रियासतों पर राजपूतों का कब्जा था। मराठों की भी कई बड़ी रियासतें थीं, इनमें ग्वालियर में सिंधिया, इंदौर में होलकर, नागपुर में भौंसले। जब दोस्त मोहम्मद भेलसा पहुंचा तो उसे खबर मिली कि 20 फरवरी 1707 को औरंगजेब की मौत हो गई। दिल्ली और उसके आसपास के गद्दी के वारिसों के बीच खूनी जंग होने लगी। अब दोस्त अपने खानदान के कुछ लड़ाकों के साथ किराए पर बंदूकें और कुछ फौजियों को लेकर हर उस हुक्मरां की तरफ से लड़ने लगे जो उन्हें पैसे देता था।
दोस्त ने खानदान के लोगों को बुलाया
भेलसा में आने के बाद दोस्त मोहम्मद खान सबसे पहले सीतामऊ के राजा के साथ जुड़े, फिर भेलसा के गवर्नर इसके बाद फिर मालवा के डिप्टी गवर्नर और बाद में मंगलगढ़ के राजा से जुड़ गए। मंगलगढ़ के राजा की मौत के बाद उसकी मां ने 1708 के आसपास दोस्त मोहम्मद खान को मंगलगढ़ किले का दोस्त मुख्तार बना किया। कहा जाता है कि इसी दरमियान दोस्त मोहम्मद खान ने फतेह बीबी से शादी कर ली थी, जो मंगलगढ़ के ही एक राजपूत खानदान की बेटी थीं। 1709 के आसपास दोस्त मोहम्मद खान ने ताज मोहम्मद खान से बैरसिया रियासत तीस हजार रुपए वार्षिक किराये पर ले ली। यह भोपाल के उत्तर में करीब 22 मील दूर है। उस दौरान 30 हजार रुपए बड़ी रकम थी। यह राशि दोस्त मोहम्मद के विद्रोही सैनिकों ने तब फतेह बीबी से फिरौती के रूप में ले ली, जब गुजरात के हमले के वक्त उन्होंने दोस्त मोहम्मद को गिरफ्तार कर लिया था। अब दोस्त मोहम्मद को अहसास हुआ कि उसे खुद को महफूज रखने के लिए अपने खानदान के लोगों की जरूरत है, जो हर हाल में उसकी तरफदारी करें और हमेशा उसके आसपास रहे, ऐसे में उन्होंने अफगानिस्तानमें अपने खानदान के लोगों से राब्ता कायम किया। तब 1712 में मिराजी-खेल खानदान के 50 जवान सिपाहियों का समूह बैरसिया आया। इनके साथ उसकी बीवी, पिता और पांच भाई भी आए। कहा जाता है कि बाद में यही लोग भोपाल के बर्रूकाट पठान कहलाए। इसी समय मंगलगढ़ की रानी के पड़ोसी रियासत उसके खिलाफ एक होने लगे और जंग के लिए चुनौती दी। इसी जंग के बाद गी दोस्त मोहम्मद खान ने अपनी ताकत और रियासत का इजाफा किया।
मंगलवार, 28 फ़रवरी 2012
गुरुवार, 26 मई 2011
एक थे इशरत कादरी
अदब की खिदमत के लिए उन्होंने कई मरकज कायम किए और 1946 में उन्हें मरकज़े अदब कायम की। इसके तहत अदबी मेहफिले जमा करती थीं। लिटरेचर पर चर्चा होती थी। यह सिलसिला 1952 तक चला, फिर मरकाजे अदब को पब्लिशर्स बना दिया। तब से अब तक कई किताबें शाया कीं इनमें शायरी, मजामीन बगैर की किताबें शामिल हैं। इसके बाद कादरी लाइब्रेरी कायम की। इसके अलावा उर्दू राइटर्स गिल्ड, काजीवजदी उल हुसैनी अदबी फॉम्म बनाई। इन सभी का मकसद, अलग- अलग शायर, कवि, लेखक वगैरह को एक मंच पर लाना था इशरत कादरी की 1984 में उर्दू अकादमी के मार्फत शायरी की एक किताब ‘शहरनुमा’ शाया हुई। एक और किताब आसमां सायबां इस महीने शाया होने को तैयार है, लेकिन इससे पहले की यह किताब शाया हो पाती, इशरत कादरी ने 17 मई की अल सुबह इस फानी दुनिया को अलविदा कह दिया।
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